June 1, 2023

मैन्ग्रोव फारेस्ट इंसानी हवस की भेंट चढ़े, 97 फीसद जंगल नष्ट ! 40 साल से पेड़ लगा रहे राजन ने बदली तस्वीर

मैन्ग्रोव फारेस्ट का संरक्षण पर्यावरण के लिए बहुत जरूरी है। दुष्यंत कुमार का एक बहुत ही प्यारा शेर है; ‘कौन कहता है आसमां में सुराख नहीं हो सकता एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारो।’ इस शेर में दुष्यंत कुमार ने किसी लक्ष्य को हासिल करने की में एफर्ट की इंटेंसिटी पर बात की है। उन्होंने बताया है कि अगर कोई इंसान सही दिशा में और पूरी शिद्दत से कोशिश करे तो हर टारगेट अचीव किया जा सकता है। भले ही हिंदी भाषाई प्रदेश से मीलों दूर मलयालम भाषा वाले प्रदेश केरल में रहने वाले राजन ने इस शेर को न सुना हो, लेकिन वे मेहनत की महत्ता जानते हैं। उन्होंने अपनी कड़ी मेहनत से दुष्यंत कुमार के शेर को चरितार्थ कर दिखाया है। मैन्ग्रोव फारेस्ट का संरक्षण कर रहे राजन पेशे से मछुआरे हैं। जानिए, इनके पर्यावरण प्रेम और मैंग्रोव की कहानी।

लोगों ने मैंग्रोव राजन रख दिया नाम

केरल के कन्नूर जिले में रहने वाले राजन पर्यावरण संरक्षण के मिशन पर हैं। राजन ने पिछले 40 साल में हजारों मैंग्रोव उगाए हैं। लोगों को जागरूक कर रहे राजन मैंग्रोव से कुछ इस तरीके से जुड़ चुके हैं कि लोगों ने उनका नाम ही मैंग्रोव राजन रख दिया है। मछुआरे के पेशे में होने के कारण राजन नाव से घूमते हैं और आश्चर्यजनक बात ये कि नाव से नाम से घूम-घूम कर उन्होंने पिछले 40 साल में हजारों मैंग्रोव पेड़ उगाए हैं।

मछली पकड़ने के साथ-साथ मैंग्रोव पर भी ध्यान

मैन्ग्रोव का संरक्षण कर रहे राजन स्थानीय लोगों को भी मैंग्रोव संरक्षण के प्रति जागरूक करते हैं। राजन अपनी दिनचर्या के बारे में बताते हैं कि पयंगड़ी नदी में वे अपनी छोटी सी नाव लेकर निकलते हैं और मछली पकड़ते हैं। बीच-बीच में थोड़ा समय निकालकर मैंग्रोव के पेड़ों को देखते हैं जिन्हें पिछले कई सालों में उन्होंने खुद अपने हाथों से लगाया है। मैंग्रोव की देखभाल कर रहे राजन इसको प्रचारित भी कर रहे हैं।

क्यों जरूरी है मैंग्रोव

स्थानीय लोगों को मैंग्रोव संरक्षण के लिए प्रेरित कर रहे राजन बताते हैं कि मलयालम भाषा में मैंग्रोव को कंडल कहा जाता है। ऐसे में मैंग्रोव से जुड़े होने के कारण लोग उन्हें कंडल राजन भी पुकारते हैं। पर्यावरण संरक्षण के बारे में कहते हैं कि मछुआरा होने के नाते उन्हें हरियाली का महत्व भली-भांति पता है। पिछले कई वर्षों में तमाम लोगों ने पर्यावरण से खिलवाड़ किया है। हरियाली लगातार घटती जा रही है। राजन बताते हैं कि मैंग्रोव मछलियों के अलावा समुद्री और गैर समुद्री प्रजातियों के लिए ब्रीडिंग ग्राउंड भी होता है। यानी मैंग्रोव के होने के कारण मछलियां अच्छी मात्रा में जन्म लेती हैं। इनके अलावा कई और जलचर भी पानी में रिप्रोडक्शन करते हैं।

हवस की भेंट चढ़े मैंग्रोव

राजन बताते हैं कि केरल के कन्नूर में उन्होंने मैंग्रोव की लगभग दो दर्जन प्रजातियां देखी हैं, लेकिन अधिकांश मैंग्रोव इंसानों की हवस की भेंट चढ़ गए। हवस जैसा कठोर शब्द इसलिए क्योंकि तथाकथित तरक्की के नाम पर पर्यावरण से लगातार खिलवाड़ हो रहा है। प्राकृतिक रूप से जिन इलाकों में मैंग्रोव पाए जाते हैं वहां अब मैंग्रोव नहीं दिखाई देते। राजन बताते हैं कि झींगा या धान की खेती के लिए बड़े पैमाने पर मैंग्रोव की कटाई हो रही है।

मैंग्रोव से क्लाइमेट चेंज का मुकाबला

गौरतलब है कि इकोसिस्टम को संतुलित रखने में मैंगो काफी अहम भूमिका निभाते हैं। पर्यावरणविदों के मुताबिक क्लाइमेट चेंज का मुकाबला करने में मैंग्रोव बहुत मदद करते हैं। केरल में सदाबहार मैंग्रोव उत्तरी केरल यानी मालाबार में पाए जाते हैं। खास तौर पर मैंग्रोव कन्नूर जिले और कासरगोड जिले में पाए जाते हैं। 97 फीसद मैंग्रोव नष्ट होने के बावजूद तमाम चुनौतियां आईं, लेकिन राजन ने हार नहीं मानी और अपने हिस्से का योगदान करना जारी रखा। वे कहते हैं कि नुकसान रोकना उनके बस में नहीं है लेकिन वह इतना तो सुनिश्चित कर ही सकते हैं कि अधिक से अधिक पौधे लगाए जाएं इसलिए वे बीज या पौधे लगाने के लिए खाली जगहों की तलाश करते हैं।

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